Thursday, 24 September 2020

छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास

  

 

   छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास 



* ऐतिहासिक स्त्रोतों  की दृष्टि  से छत्तीसगढ़  के इतिहास  को तीन भागो :-

      प्रागैतिहासिक  काल ( लिखित  विवरण  उपलब्ध  नहीं ),

     आद्य ऐतिहासिक  काल (लिखित विवरण पढ़ा नहीं जा सका ) 

      ऐतिहासिक काल ( लिखित विवरण पढ़ा जा सका ) 

      में बाटा जाता है। 


* राज्य  में प्रागैतिहासिक  कालीन  साक्ष्यों की सर्वाधिक  जानकारी  कबरा पहाड़  से प्राप्त हुई है। 



    प्रागैतिहासिक  काल 


* प्रागैतिहासिक  काल  में आदिमानव  पत्थरो  को घिसकर  औजार बनाते थे एवं जंगली जानवरो का शिकार करते थे।   कालांतर  में आदिमानव  गुफा में रहने  करने लगा।  तथा  कंदमूल  संग्रहण  का कार्य  भी करने लगा। 


* प्रागैतिहासिक  काल को पाषाण युग  भी  कहा जाता है।   विकास क्रम की दृष्टि से  सम्पूर्ण युग  को  निम्न 4  भागो में विभाजित किया गया  :-

 

 

१.  पूर्व  पाषाण युग 

२.  मध्य पाषाण युग 

३.  उत्तर पाषाण युग 

४.  नव पाषाण युग 




     *** पूर्व  पाषाण युग ***

*छत्तीसगढ़ प्रदेश में पूर्व पाषाण युग के औजार मुख्यतः  रायगढ़ की  महानदी  घाटी एवं  सिंघनपुर  की गुफा से प्राप्त  हुए है। इन स्थलों  से पत्थर के हस्तचलित  कुदाल  प्राप्त  हुए है , तथा  सोनबरसा से शैलचित्रो  के साथ -साथ  पाषाणयुगीन  पत्थर  के लघुपाषाण  औजार भी प्राप्त हुए है। 

 

 

     *** मध्य पाषाण युग *** 

* लाल रंग की छिपकली , घड़ियाल , कुल्हाड़ी  आदि  की चित्रकारी  के साक्ष्य  कबरा  पहाड़ ( रायगढ़ )  से प्राप्त  हुए है। इसके  अतिरिक्त  लम्बे  फलक  वाले औजार , अर्द्धचंद्राकर  लघु  पाषाण  औजार  भी इसी  स्थान  से प्राप्त हुए है। 

* मध्य पाषाणयुगीन  500  पाषाण  घेरे  स्मारक  बालोद  ( करहीभदर , चिरचारी , सोरर )  व  कोंडागांव  ( गढ़धनोरा ) से प्राप्त  हुए  है। 

* पाषाण  घेरो के अंतर्गत  शवों को  दफनाकर  बड़े  पत्थरो  से ढक  दिया  जाता था। 




       *** उत्तर  पाषाण युग ***

*  मानव  आकृतियों का  चित्रण , औजारो  की  खुदी हुई  आकृति  आदि  धनपुर ( बिलासपुर ) महानदी  घाटी  एवं सिंघनपुर  ( रायगढ़ ) की गुफाओं  से  मिलती है। 

* सबसे प्राचीन शैलचित्रो  में सिंघनपुर  गुफा  के चित्रों  की  चित्रकारी  गहरे  लाल रंग  से हुई है।   इन चित्रों  में चित्रित  मनुष्य  की आकृतियां   कही  सीधी , कही  डण्डेनुमा  और कही  सीढ़ीनुमा  है। 





     ***  नव  पाषाण युग ***

* छत्तीसगढ़  के अर्जुनी (दुर्ग ), चितवाडोंगरी ( राजनांदगांव )  , टेरम  (रायगढ़ )  से  मनुष्य   के  अस्थायी  कृषि  , स्थायीवास  , पशुपालन , मृदभांड  , सूत  कताई तथा  नव  पाषाण  युगीन  छिद्रित  घन  औजार  प्राप्त  हुए है।  




       आद्य  ऐतिहासिक  काल 

* इस काल का समय लगभग  2300  से 1750  ई.  पू.  है।   इसके अंतर्गत  सिंधु घाटी  सभ्यता /हड़प्पा  सभ्यता  / कांस्ययुगीन  सभ्यता को  शामिल  किया जाता है , किन्तु  इस सभ्यता  के साक्ष्य  छत्तीसगढ़  में नहीं  मिले है। 

 

 

 

 

         वैदिक  काल 


*  वैदिक  काल  में मुख्य स्त्रोत  वेद  व  अन्य  वैदिक  ग्रन्थ  है।   इस  काल को मुख्य रूप से दो भागो में  :- ऋग्वैदिक काल व उत्तर वैदिक काल  में  विभाजित   किया गया है। 

* ऋग्वैदिक काल  ( 1500 -1000  ई.  पू. ) में  छत्तीसगढ़ से संबंधित  किसी भी  प्रकार  का  विवरण  नहीं  मिलता है। 

* उत्तर  वैदिक काल  ( 1000 -600 ई.  पू. )  में ऐसा  माना जाता है ,कि  इस काल  में आर्यो  का प्रसार  छत्तीसगढ़  में  होने  लगा  था।  

*  शतपथ  ब्राह्मण  में पूर्व  एवं पश्चिम  में स्थित  समुद्रो  का उल्लेख  मिलता है।   कौषीतिकीय  उपनिषद  में विंध्य  पर्वत  का उल्लेख  प्राप्त  होता है।  उत्तर  वैदिक  साहित्य  में नर्मदा  नदी  का उल्लेख  रेवा  नदी  के रूप में मिलता  है।  






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