Wednesday, 26 August 2020

छत्तीसगढ़ की प्रमुख जनजातियां chhattisgarh ki janjatiya, Tribe of chhattisgarh, cgpsc

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*****छत्तीसगढ़ की  प्रमुख जनजातियां ****

 

*  छत्तीसगढ़ भारत का एक  जनजातीय  बाहुल्य  राज्य है।  यहां 42 प्रकार की  जनजातियां पाई जाती है, जो 161 उप - समूहों  में विभाजित है।  

*  छत्तीसगढ़ की अधिकांश  जनजातियां ,प्रोटो-ऑस्ट्रेलॉयड  प्रकार की है।  

*  छत्तीसगढ़ में बस्तर को जनजातियों की भूमि कहा जाता है।



प्रमुख पिछड़ी जनजातियां *****

 * भारतीय  संविधान  के अंतर्गत  राष्ट्रपति  ने राज्य की 5  जनजातियों  अबूझमाड़िया , बैगा ,कमार , कोरवा  व  बिरहोर  को  पिछली  जनजाति घोषित  किया गया है।   अबूझमाड़िया जनजाति  के विकास  के लिए  वर्ष  1978 -79  मे अबूझमाड़िया  विकास  प्राधिकरण की स्थापना  हुई।  इनका  विवरण  इस प्रकार है:-

१.  वितरण 

२. रहन -सहन 

३. सामाजिक  व्यवस्था 

४. अर्थव्यवस्था 

५. धार्मिक  और सांस्कृतिक  जीवन  

 

 

 

 

****** 1. अबूझमाड़िया ***********

   

* वितरण अबूझमाड़ीया  राज्य की प्रमुख जनजाति  है।  ये मुख्यतः  दण्डकारण्य  पठार  के  अबूझमाड़ की ऊँची  पहाड़ियों  पर  निवास करते है।  

* इसके  अतिरिक्त  ये राज्य के नारायणपुर  तथा  भोपालपटनम  के पहाड़ी क्षेत्रो में निवास करते है।  यह गोण्ड  जनजाति की उपजाति है।  ये  स्वयं  को मेटाभूम   के नाम से जानते है।  

 

* रहन -सहन  इनका घर  बांस  ,लकड़ी  एवं  मिट्टी से बना हुआ होता है ,जिसके चारो  ओर  एक  बाड़  होती है।  इस बाड़  में मुख्यतः  ये सब्जी की खेती करते है।  

 

* सामाजिक  व्यवस्था  इनका  परिवार पितृसत्तात्मक   तथा पितृस्थानीय  होता  है।   ये अनेक गोत्रो में  बंटे  होते है।  प्रत्येक  गोत्र  का अपना  टोटम  होता है। 

* टोटम  मुख्य  रूप से जनजातियों  के धार्मिक  विश्वास  से सम्बन्धित कुछ  प्रतीक चिन्ह होते है।   विवाह में युवक -युवती  की इच्छा का  विशेष महत्व  होता है।  

 

* अर्थव्यवस्था  ये मुख्यतः   स्थानांतरित   कृषि करते है ,जिसे  पेद् दा  कहा जाता है।  कृषि के अतिरिक्त  वनोपज संग्रह  व शिकार  भी  अर्थव्यवस्था  का मुख्य  स्त्रोत है। 

 

* धार्मिक  और सांस्कृतिक  जीवन  इनकी प्रमुख देवी  भूमि  माता है।  इनके  सामाजिक   संगठन  धर्म ,ओझा  आदि  के  निर्देशों से  संचालित  होते है।   ये अपराध  को पाप मानते है।  ये ककसाड़  त्यौहार  मनाते है ,तथा  इनमे  काकसार  नृत्य प्रचलित है।  

 

 

 

                    

 

 

 

 

 

 

       *****   2 . बैगा  *********

 

* वितरण  मैकल पर्वत श्रेणी , कवर्धा , राजनांदगांव , मुंगेली , बिलासपुर  में इस  जनजाति का निवास  पाया जाता है।  

 

* रहन - सहन  ये घने  जंगलो में तथा दुर्गम  क्षेत्रो में  बांस  और मिट्टी  के मकानों में रहते है।   बैगा  का सुबह  का भोजन  बासी  और  दोपहर का भोजन पेज  एवं रात्रि का भोजन बियारी कहलाता है।  इनका प्रमुख पेय पदार्थ  ताड़ी  है।   कपची  बैगा महिलाओं का प्रमुख वस्त्र है।   बैगा महिलाओं द्वारा धारण किए जाने  वाला  प्रमुख आभूषण  गोदना  है।

 

* सामाजिक  व्यवस्था  बैगा परिवार पितृसत्तात्मक  तथा  पितृस्थानीय होते है।   समाज में स्त्रियों को  विशेष  सम्मान  दिया जाता है।   इनमे  गोत्र  अन्तर्विवाद  भी  प्रचलित होता है।  इनमे  केवल  देवर से  विधवा विवाह मान्य है।   स्त्री  -पुरुष  का एक साथ  तिनका  तोड़ना  तलाक  का  सूचक  माना जाता है।  

* अर्थव्यवस्था  ये मुख्यतः  प्रकृति  पर  निर्भर  होते है।   ये वनो  से शहद ,  फल - फूल , औषधियां   एकत्रित  करते है।  सामान्यतः  ये स्थानांतरण  कृषि  करते है ,जिसे   बेवार   कहा जाता है।  

   

* धार्मिक एवं सांस्कृतिक  जीवन  बैगा  जनजाति  का शाब्दिक अर्थ  पुरोहित  होता है।  इनके प्रमुख देवता  बूढ़ादेव  है , जो साल वृक्ष पर निवास करते है।  ये भूमि की रक्षा हेतु  ठाकुर देव तथा बीमारियों से रक्षा हेतु दुल्हा देव की पूजा करते है।  ये  मृतकों को दफनाते है ,परन्तु  विशिष्ट व्यक्तियों  का  दाह  संस्कार  करते है।  इनका प्रमुख  नृत्य करमा   है।  इसके साथ  ही विमला ,परधौनी  एवं फाग  गीत  भी इनमे प्रचलित है।  

 

 

 

 

 

 

      ******  3 . कमार  *******    

 

* वितरण  ये जनजाति  बिन्द्रानवागढ़ , गरियाबंद , राजिम , मैनपुर , देवभोग  तथा  धमतरी  में पाई  जाती है।  ये लोग  मुख्यतः  सम्पूर्ण  बस्ती  से  अलग   नदी के  समीप  रहते है।  ये  रायपुर  संभाग  क्षेत्र  की  विशेष पिछड़ी  जनजाति है।  पहाड़ी  पर रहने वाले  कमार  पहड़पटिया  तथा मैदान  में रहने वाले  बँधरिज्जिया  कहलाते है। 

 

* रहन -सहन   ये जंगलो  में नदी के तट पर रहते  है।  इनके घर  बांस , लकड़ी , घास  तथा  मिट्टी  के  बने होते है।   इनका मुख्य  भोजन   दाल  -चावल  व  साग  है।  कमार  स्त्री - पुरुष  दोनों ही शराब का सेवन  करते हैं।  

* सामाजिक  व्यवस्था  ये सात  बहिर्विवाह  गोत्रो में बँटे हुए  होते हैं।इनमे  समगोत्री  विवाह  वर्जित है।  " अपहरण  विवाह , सेवा विवाह  तथा  सहपालन  विवाह " प्रचलित है।  विवाह विच्छेद  तथा विधवा विवाह  मान्य  है।  इनके पंचायत  प्रधान को  कुरहा  कहते है।   घर  में किसी  की मृत्यु  होने पर  कमार  जनजाति  द्वारा  घर का  त्याग  कर  दिया  जाता  है।  

 

* अर्थव्यवस्था  इनका  प्रमुख  कार्य  बांस  शिल्प  है।   ये  आर्थिक  रूप से  पिछड़े हुए है , और झूम  कृषि , पशुपालन  एवं शिकार  इनकी जीविका  के  साधन है।  इनकी  कृषि  पद्धति को दरिया  कहा जाता है।   सर्वाधिक  गोदना , गोदवाने  वाली  जनजाति  कमार  ही  है।  

* धार्मिक  और सांस्कृतिक  जीवन  ये  जातिगत  विश्वासों  से बंधे  होते है।  बैगा  इनके पुरोहित  होते हैं।    ठाकुर देव , महादेव , दुल्हादेव   इनके  प्रमुख  देवता है।   ये  मंदिर  वाद्य  पर  गेड़ी नृत्य  करते है।   इनमे  नृत्य  के दौरान  साज - सज्जा  का प्रचलन  नहीं  है।   हरेली व  नवाखाई  इनके प्रमुख  त्यौहार है।  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

****** 4 .  कोरवा  *******

 

* वितरण   ये जनजाति  कोल  जनजाति की एक शाखा है , जो  सूरजपुर , बलरामपुर , जशपुर , सरगुजा , कोरिया  तथा  रायगढ़  जिलों में निवास  करती है।   पहाड़ी  कोरवा  तथा  दिहाड़ी  कोरवा  इनकी दो प्रजातियां है।  

 

* रहन - सहन    दिहाड़ी  कोरवा गांवो  में तथा  पहाड़ी  कोरवा  गांवो से दूर  रहते है।  विवाह  के बाद  नव -दम्पति  के नए  मकान में रहने का प्रचलन है।  इनमे पुरुष  कमीज बंडी  एवं धोती  तथा महिलाये  प्रायः  सफेद  साड़ी  पहनती है।  ये  मांसाहारी  तथा शराब के शौक़ीन  होते हैं।   चावल  की बनी  शराब  हण्डिया  इनका  प्रिय  पेय पदार्थ हैं।  

 

* सामाजिक  जीवन   ये सरल जीवन जीते हैं।   ये अनेक  बहिर्वाही  गोत्रो  में बंटे  होते है।  इनमे  सगोत्र  विवाह  वर्जित है।  इनमे  मंगी  विवाह , ढुकू  विवाह , बाल विवाह , बहु  विवाह  प्रचलित  हैं।  इनके परिवार  पितृप्रधान  एवं  पितृस्थानीय  होते है।  

 

अर्थव्यवस्था   ये खाद्य  संग्रहण व  शिकार  पर निर्भर  होते है।  पूर्व  में ये  स्थानांतरित  कृषि   बेवारी    करते थे, परन्तु  वर्तमान में पारम्परिक  कृषि करते है।  

 

धार्मिक  एवं सांस्कृतिक  जीवन   ये ठाकुर देव , बूढ़ा देव  व  खुड़िया  रानी की  पूजा करते है।   ये मृतकों  को जलाते  है , परन्तु  बच्चे  के शव को दफनाते है।  मृत संस्कार  को नवाधावी  तथा  क्रियाक्रम को  कुमारीभात कहा जाता है।   नृत्य  करते समय  पुरुष हथियार  धारण  करते हैं।   तथा  ढोलक की थाप   पर  नाचते है।   नवाखानी  , करमा , देवारी  ,सोहराई  ,होली  इनके प्रमुख त्यौहार है।  इनके द्वारा 5 वर्ष में एक बार सिंगरी  त्यौहार मनाया जाता है ,जिसमे  महिलाये  भित्ति चित्र  बनाती है।  

 

 

 

 

 

 

 

  ******* 5 .  बिरहोर  ******

 

वितरण   ये जनजाति  विशेषकर रायगढ़ तथा  जशपुर  जिलों में  व्याप्त है।  ये छत्तीसगढ़ी  को मातृभाषा  के रूप में  प्रयुक्त करते है।  

 

*   सामाजिक  व्यवस्था   इनका समाज  पितृसत्तात्मक  है।  समाज में गोत्र  बहुविवाह  का प्रचलन  पाया जाता है।  इनके  युवागृह   को गीतूओना  कहते है।  

 

अर्थव्यवस्था   कृषि  एवं वनोपज  जीविका का मुख्य स्त्रोत है।  

 

धार्मिक  एवं सांस्कृतिक  व्यवस्था    ये प्रकृति के उपासक  होते  है।  फगुआ , रामनवमी  एवं  करमा  इनके प्रमुख त्यौहार हैं।  

 

 

 

 

 

           

 

 

     ********* 6. गोण्ड  जनजाति ******


* वितरण   राज्य की  जनजातियो में गोण्ड  जनजाति   समूह सबसे  बड़ा  जनजाति है।  ये मुख्यतः  दक्षिण  राजनांदगांव , कांकेर , जगदलपुर  ,  व दंतेवाड़ा  जिलों  में निवास  करते है।  गोण्ड  जनजाति  का सर्वाधिक  संकेन्द्रण  बस्तर  संभाग  में है। 

   

 

 *  रहन - सहन  ये दुर्गम  वन  तथा पहाड़ी  क्षेत्रो में घास -फूस  एवं  मिट्टी के  बने मकानों  में रहते हैं।   इनका मुख्य आभूषण  गोदना  होता है।   ये मोटे  अनाजों   से बने  भोजन का सेवन करते हैं।  

 

 सामाजिक व्यवस्था  गोण्ड  समाज पितृसत्तात्मक , पितृवंशीय  तथा पितृस्थानीय  होते है।    गोण्ड  स्वयं को कोयतोर  कहते है ,  जिसका अर्थ पर्वतवासी  होता है।  इस जनजाति में प्रचलित प्रमुख विवाह पद्धति  दूध  लौटवा  , वधू मूल्य    व  विधवा  विवाह     है।  गोण्ड जनजाति  अपने घरो की दीवारों पर   नोहडेरा   अलंकृत  करते है।

* अर्थव्यवस्था  इनकी  जीविका  का मुख्य  आधार  कृषि है।  इसके अतिरिक्त  ये  पशुपालन  , मुर्गीपालन  व  मजदूरी भी करते है।  

* धार्मिक  और सांस्कृतिक  जीवन    दुल्हादेव  गोण्ड  जनजाति  के प्रमुख  देवता है  तथा  बस्तर क्षेत्र  में दंतेश्वरी  देवी  प्रमुख है।  

* मेघनाद  त्यौहार    इसी  जनजाति से संबंधित  है।   हिन्दू  धर्म के  प्रभाव  के कारण  ये भगवान  शिव  , माता  काली  व  भगवान  हनुमान  की पूजा करते है।  


*  गोंडों  में मृत  संस्कार  के समय   कोज्जी कुण्डा    मिलन  संस्कार  होता है , जो क्रमशः  तीसरे  व दशवें  दिन  होता है।  जन्म  के छठे दिन मनाया  जाने   वाला  संस्कार  जन्मोत्सव  है।

  

 

 

 

 

   *******  7 .  उराँव  ******

 वितरण     यह जनजाति  सरगुजा , जशपुर , बलरामपुर  तथा रायगढ़  में पाई  जाती है।   ये द्रविड़  भाषा  परिवार  से सम्बद्ध  है ,  जिन्हे  धनका या धनगढ़ कहा जाता  है।  

 

रहन - सहन    ये  जंगलो में  खेतो के समूहों  में निवास करते है।   ये लकड़ी  , बांस , घास  और खपरैल के घर बनाते  है। स्त्रियां  साड़ी पहनती है , और पीतल के आभूषण और मोतियों की माला पहनती है।  पुरुष धोती  तथा लम्बी पूंछ वाला साका  पहनते है।  

 

*   अर्थव्यवस्था   ये किसान एवं कृषि मजदूर होते है।  इसके  आलाव  ये वनोपज  एकत्र  करने , आखेट , मुर्गीपालन  जैसे  कार्य  भी करते है। आर्थिक जीवन में स्त्री - पुरुष   दोनों का समान  योगदान होता है।  

 * सामाजिक जीवन   इनका जीवन पितृसत्तात्मक होता है।  समाज में बहुविवाह  प्रचलन पाया जाता है।  इस जनजाति के युवाग्रह  धुमकुरिया है , तथा इसके मुखिया  को धांगर महतो   कहते है।  यह छत्तिसगढ़  की सर्वाधिक  शिक्षित  जनजाति है।  इस जनजाति के  अंतर्गत  गांव के प्रमुख  को मांझी   कहते है।      



धार्मिक  एवं सांस्कृतिक  जीवन   इस  जनजाति  का सबसे  अधिक  धर्मांतरण  हुआ।   इनकी मुख्य देवी सरना देवी है, जो साल वृक्ष पर निवास करती है इसके अतिरिक्त ये धर्मेश नामक  ईश्वर की पूजा करते है  तथा  सफेद  मुर्गी की बलि  चढ़ाते है।  

*  खट्टी , सरहुल  एवं फाग  इनके  प्रमुख  त्यौहार  तथा करेया  पारम्परिक  पोशाक  है।  इनकी  प्रमुख  बोली कुरुख  है।  ये सरहुल तथा करमा  नृत्य करते है।  

 

 

 

 




    ****** 8 . माड़िया  ******

 

वितरण    इस जनजाति  का मुख्य  निवास  बीजापुर , जगदलपुर ,कोटा , दंतेवाड़ा  व बस्तर  जिलों  में  है।  

 

* रहन - सहन   यह जनजाति जंगल में पृथक  झोपड़ी में रहती है , जिसे   सिहारी कहा जाता है।

 

सामाजिक जीवन   इस जनजाति का  समाज पितृसत्तात्मक  है।  इनको दण्दारि   माड़िया भी कहा जाता है।  दण्डामी  माड़िया  इनकी प्रमुख उपशाखा है।   यह जनजाति  हनालगट्टा ( स्मृति  स्तम्भ ) तथा  मृतक स्तम्भ का निर्माण करती है।  

 

* अर्थव्यवस्था    ये मुख्य रूप से  झूम  कृषि  करते है  ,जिसे पेद्दा  कहा जाता है , तथा इनका पेय पदार्थ  सल्फी  है।

 

 

* धार्मिक  और सांस्कृतिक  जीवन   जात्रा  पर्व के  दौरान ये  गौर नृत्य करते है।  इस नृत्य  के दौरान  ये बायसन नामक जंगली जीव  के सींग से बनी टोपी लगाकर  नृत्य करते है।  इस जनजाति को बायसन हार्न माड़िया या दण्डामी  माड़िया भी कहते है।   दूल्हादेव  व  बूढ़ादेव  इनके प्रमुख देवता है।   भूमि  माता इनकी आराध्य देवी है।  

 

 

 

 

 



    ****** 9. मुड़िया / मुरिया ******

 

वितरण   इस जनजाति  का निवास  स्थान  कोण्डागांव  एवं नारायणपुर  क्षेत्र है।   यह गोण्ड  जनजाति की एक उप जाति  है।  

 

 

सामाजिक  व्यवस्था   इनका समाज पितृसत्तात्मक  होता है।  तथा समाज में भगेली  विवाह , दूध  लौटवा विवाह का प्रचलन है।   इनमे  समगोत्री  विवाह  वर्जित  होता है।   इनका प्रमुख पेय पदार्थ  सल्फी  है।    परगने  का प्रमुख मांझी  कहलाता है।   समाज में युवागृह घोटूल   का विशेष  महत्व पाया जाता है।  

 

अर्थव्यवस्था   ये मुख्य रूप से स्थायी कृषि करते है।   ये बांस  शिल्प  व  चित्रकला   में कुशल  होते है।  

 

*   धार्मिक  और  सांस्कृतिक  जीवन     सांस्कृतिक  रूप से यह जनजाति एक समृद्धशाली  जनजाति  है।   इस जनजाति द्वारा पूस  कोलांग   नृत्य   किया   जाता है।   मृत्यु के अवसर पर  इनके द्वारा  घोटुलपाटा  नृत्य  किया जाता है।   इस जनजाति  के  लोग   लिंगोपेन  , ठाकुर देव  व महादेव की पूजा  करते है।  

 

*   नवाखानी  जात्रा  , सेसा  इनके  प्रमुख  त्यौहार  है  तथा  उत्सवों  की श्रृंखला  को ककसार  कहा जाता है।  

 

 

 

      

 

 

 

 

    ******* 10.  अगरिया  ******

 

* वितरण    इस जनजाति  के लोग मुख्यतः  बिलासपुर में  मैकाल  पर्वत   श्रृंखला  के आस - पास  अधिकतर  निवास करते है।  ये  छत्तीसगढ़ी  भाषा   का प्रयोग   करते है।   इन्हे राज्य  के केल्हा   अगरिया , बिलासपुर  में खंटिया  चोक  व  महाली  असुर  अगरिया  तथा रायपुर  में गोडडूक  अगरिया  कहा जाता है। 

 

* अर्थव्यवस्था   आग से उत्पन्न  यह समुदाय  आज  भी लौह - अयस्क  पिघलाने  का  कार्य  करता  है।   ये  अपने को लोहार भी कहते है।  

 

 

 

 

 

 

  ******* 11.  कोरकू  *****

 

वितरण   इस जनजाति का निवास छत्तीसगढ़ में   सूरजपुर ,  सरगुजा , बलरामपुर  तथा  कोरिया  है।  

 

सामाजिक जीवन   इनका  समाज पितृसत्तात्मक  होता  है।  समाज  में पाटो  पुनर्विवाह  प्रचलन  में पाया जाता है।    इनके  जातीय  संस्कार  को पोथड़िया  कहा जाता है।  

 

धार्मिक  - सांस्कृतिक  जीवन  थापती   इनका  प्रमुख नृत्य  है ,  तथा  आषाढ़  माह  में ये ढांढल  नृत्य   भी करते है।   इस जनजाति  में मृतकों  को  दफनाया जाता है , जिसे  सिडोली  प्रथा कहा जाता है।  

 

 

 

   

      

 

   *******12.  हल्बा  ****

 

वितरण   यह जनजाति राज्य के  बस्तर , रायपुर , कोण्डागांव , कांकेर ,  बालोद  में निवास करती है।  

 

 *  अर्थव्यवस्था   यह जनजाति  आर्थिक  दृष्टि से  राज्य की सबसे  विकसित जनजाति  मानी जाती है।   इनकी प्रमुख बोली हल्बी है।  इनका मुख्य व्यवसाय कृषि है।  

 

सामाजिक  एवं धार्मिक  जीवन   इनका  समाज  पितृसत्तात्मक  है।  इनके समाज में मांस - मदिरा  का सेवन  वर्जित है तथा  रीति-रिवाज  हिन्दू  धर्म  से  अधिक  मिलते है।  

 

 

 

 

 

      ***** 13.  भैना  *****

 

*   ये रायगढ़  तथा बिलासपुर  के उपजाऊ क्षेत्र में  व्याप्त है।  

* ये छत्तीसगढ़ी  बोली का व्यवहार  करते है।   शिक्षित  होने के कारण  ये लोग  अपेक्षाकृत   कम  रूढ़िवादी  है।  

 

 

   ****** 15.  बिंझवार  *****

 

*  यह  जनजाति  रायपुर , बिलासपुर , बलौदा  बाजार  एवं सोनाखान  क्षेत्र  में  निवास  करती है।  

* इनकी  मातृभाषा  छत्तीसगढ़ी   है , परन्तु ये  सदरी  भाषा  का भी प्रयोग करते है।   

* राज्य  के महान  क्रान्तिकारी वीरनारायण  सिंह  इसी समुदाय के थे।   ये  सोनाखान  स्टेट  के जमींदार  थे।  

* इस जनजाति  का जाति चिन्ह  तीर  है , तथा  इनके समाज में तीर  विवाह  का भी प्रचलन  पाया  जाता है।   ये प्रमुख देवता बारह  भाई  बेटकर  की पूजा  करते है।  तथा  प्रमुख देवियों  में विध्यवासिनी की पूजा करते थे।    

 

* इनकी  महासभा को कोटा सागर  कहा जाता है।  

 

 

 

 

 

 

    ****** 16.  कँवर *****

 * यह जनजाति , बलरामपुर ,सरगुजा ,सूरजपुर , बिलासपुर  तथा  रायगढ़  क्षेत्र में निवास  करती है।   इनकी भाषा  छत्तीसगढ़ी  एवं सदरी  है।  

*  सैन्य  कार्य के अतिरिक्त कृषि  व मजदूरी  इनकी आजीविका के मुख्य  स्त्रोत  है।  

* सरगाखण्ड  इस जनजाति के प्रमुख देवता है।  ये स्वयं  को कौरवों  का  वंशज  मानते है। 

 

 

 

 

 

       ****** 17.  खड़िया  *******

*  यह  जनजाति रायगढ़  व सरगुजा  क्षेत्र  में निवास करती है।   इनकी  मातृभाषा खड़िया  है।  

* बंदा  इनके प्रमुख देवता है।  तथा पूस -पुन्नी  व करमा  प्रमुख पर्व है।  

 

 

 

 

 

      ***** 18.  बिरजिया  ******

 

*   ये अपनी  मूल निवास स्थान  सरगुजा जिले  को मानते है।  

*  ये  मुंडा  परिवार की बिरजिया  भाषा के साथ सदरी का भी प्रयोग करते है।  

* ये सरहुल  , करमा , फगुआ , तथा रामनवमी  त्यौहार  मनाते  है।  

 

 

 

 

 

 

******* 19.  धनवार  *****

*  यह जनजाति बिलासपुर जिले के पहाड़ी क्षेत्रो में निवास करती है।  इस जनजाति में धनुष का विशेष महत्व  होता है।   

 

 

 

 

 

 

******* 20.  धुरवा  *****

* इस जनजाति का संकेन्द्रण  बस्तर , कोण्डागांव  , सुकमा  व दंतेवाड़ा  क्षेत्रो में  पाया जाता है।  

* धुरवा  पहले  स्वयं  को प्रज्ञा कहते थे।  इनकी मातृभाषा  परजी  द्रविड़ भाषा  परिवार से  संबद्ध है।   ये हल्बी  का प्रयोग  द्वितीय  भाषा के रूप में करते है।  

* इनके बच्चो के लिए पृथक घर धांगा बक्सर   होता है।  ग्राम का मुखिया मडूली  तथा धार्मिक कार्य करने वाला जानी कहलाता है।

* इनके प्रमुख देवता  दंतेश्वरी देवी , डूमा , डोंगरा  देव  ,झोर देव  आदि है।  

 

 

 

 

 

***** 21.  सौरा  *****

* यह जनजाति महासमुंद तथा रायगढ़ में निवास करती है।   ये  स्वयं  को  शबरी   का पूर्वज मानते है।  इनका व्यवसाय  सांप पकड़ना है।  

 

 

 

 

 

 

 ***** 22.  पारधी  ******

* इनका निवास  क्षेत्र  रायगढ़ , सरगुजा  तथा कोरबा में है। 

* पारधी  शब्द  का अर्थ    आखेट  होता है।  ये  काले पक्षियों का शिकार करते है। 

 

 

 

 

***** 23.   कोया  /दोरला  /कोयतूर  *****

* ये बस्तर के गोदावरी  अंचल में  निवास करते है  तथा यदा - कदा अपने को  दोरला  या  कोयतूर  भी कहते है।   यह  गोण्ड  वर्ग की ही  उपजाति है।  

 

 

 

 

 

****** 24. मझवार  *****

* यह जनजाति रायगढ़  तथा  सूरजपुर  क्षेत्र में पाई जाती है।  

*  इनको  मांझी  या माझिया  के नाम से  भी जाना जाता है।  इसकी  उत्पत्ति   मुण्डा , गोण्ड  तथा  कंवर  जनजाति से हुई है।    

 

 

 

 

 

 

***** 25.  खैरवार  *****

* इनका निवास  बलरामपुर , बिलासपुर , सरगुजा  और सूरजपुर है। 

* इस जनजाति के द्वारा खैर  वृक्ष से कत्था निकलने का कार्य किया जाता है।   

 

 

 

 

 

 

****** 26.  परधान *****

* यह  जनजाति बलौदा बाजार , बिलासपुर  एवं रायपुर  के क्षेत्रो में निवास करती  है।  

* ये पहले   गोण्ड राजाओं के गीत गायक    व  गीत  वादक  थे।  ये लिंगोपाटा गायन  गाते  हैं।  

 

 

 

 

 

  ***** 27. भुंजिया  *****

* यह  जनजाति  राज्य सरकार द्वारा  घोषित  विशेष पिछड़ी   जाति है।  ये रोगोपचार  हेतु  तपते  लोहे  का प्रयोग करते है।  

* इनका  रसोई  घर लाल बंगला  कहलाता है।   इनके  विकास  के लिए  राज्य सरकार  ने  भुंजिया  विकास  अधिकरण  की स्थापना की है।  

 

 

 

                   

   

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