Friday, 21 August 2020

छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकनृत्य , Folk dance of chhattisgarh, chhattisgarh ke pramukh lok nritya ,cgpsc



****छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकनृत्य****

 

 

* छत्तीसगढ़  में विविधतापूर्ण  लोकनृत्यों की  प्रवृत्ति  मिलती है।  यहां का जनजातीय क्षेत्र हमेशा   अपने  लोकनृत्यों के लिए  विश्व प्रसिद्ध  रहा है। 

* इस  क्षेत्र  में विभिन्न  अवसरों  ,पर्वो  से  संबंधित  भिन्न -भिन्न नृत्य  प्रचलित है , जिनमे  स्त्री -पुरुष  समान  रूप से भाग  लेते है। 

 

छत्तीसगढ़ के प्रमुख नृत्यों  का वर्णन  इस प्रकार है :-

 

        **** पंथी  नृत्य  *****

 * यह  छत्तीसगढ़ का प्रमुख लोकनृत्य है। 

* यह  सतनामी  पंथियों  द्वारा  किया  जाता है। यह नृत्य माघ पूर्णिमा के दिन  जैतखाम  की स्थापना  पर  उसके चारो ओर  गायन के साथ  किया जाता  है।  

* पुरुष तथा महिलाओं  दोनों के द्वारा यह नृत्य  किया जाता है।  इसमें प्रयुक्त वाद्ययंत्र  मांदर  व झांझ है।  

* इस नृत्य  के प्रमुख कलाकार  राज्य  के  देवदास  बंजारे  थे।    

 

 

 

 

 

 

 

     **** सुआ  नृत्य / द - गौरा  नृत्य  ****

* यह नृत्य देवार  जनजाति की महिलाओं द्वारा  दीपावली  के समय  किया जाता  है , हालांकि  इस  नृत्य  में जाति बंधन नहीं है। 

* इसके अंतर्गत  मिट्टी के तोते  बनाकर  चारो ओर  थापड़ी  बजाकर  नृत्य किया जाता है।  यह तोता  शिव -पार्वती  का प्रतीकात्मक स्वरूप माना जाता है। 

* प्रमुख  लेखक  मुकुटधर  पांडेय  ने इस  नृत्य को  छत्तीसगढ़  का गरबा  कहा है।  

 

 

नोट  :-  द -गौर  को  द  बाइसन  हार्न नृत्य ,

              द  गौरा को  सुआ  नृत्य 

              द  गौरा -गौरी  के गोण्डी नृत्य  कहा जाता है। 

 

 

 

 

  

         ***** खम्ब  स्वांग  नृत्य *****

* यह मुख्यतः  कोरकू  जनजाति  द्वारा किया जाता है। 

* यह  स्वांग  मूलरूप  से  खम्बे  के आस -पास  किया जाता है।  इस स्वांग  में खम्ब  का  तात्पर्य   रावण पुत्र  मेघनाथ से है।  

 

 

        *****  राउत  नाचा / राउत  नृत्य *****

* यह नृत्य  बिलासपुर जिले  में दीपावली  उत्सव  के दौरान  किया जाता है।  इसे  गहिरा नाच  के नाम से  भी जाना जाता  है। 

* यह नृत्य मुख्यतः  राउत  जाति  द्वारा किया जाता  है 

* यह  नृत्य  भगवान  कृष्ण  की पूजा  के  प्रतीक  के रूप में  किया जाता है।  इसमें  केवल  पुरुष ही भाग लेते है। 

* राउत  नाचा में दोहे गाए जाते है  तथा  इसका  प्रमुख  वाद्ययंत्र   गड़वा बाजा है।  

 

 

   

           ***** मांदरी  नृत्य  ****

*  यह नृत्य मुड़िया/मुरिया  जनजाति के युवा  गृह  घोटुल  के चारो और घूम -घूमकर  किया जाता है।   इसमें  गीत  नहीं  गाया  जाता  है। 

 * इस नृत्य  में पुरुष  एवं महिला दोनों भाग लेते है। 

*  इस नृत्य  में पुरुष  एवं महिला  दोनों भाग लेते है ,दोनों अलग -अलग  पंक्तियों में  गोला या अर्द्ध  गोला  बनाकर नृत्य  करते है।  इसमें पूस  कोलंगा  नृत्य सिर्फ  पुरुष  द्वारा  किया जाता है।  

 

 

 

 

 

      ***** करमा  नृत्य  ***** 

* करमा  नृत्य  गोण्ड  , बैगा , उराँव  व  बिझवार  जनजाति का सबसे  पुराना  लोकनृत्य  है। 

* यह  नृत्य  विजयदशमी से प्रारम्भ  होकर   अगली  वर्षा  ऋतु के आगमन  तक  चलता है। 

* इसमें पुरुष  और स्त्रियां  दोनों नृत्य  करते है।  

* यह नृत्य  करमा  देवता  को प्रसन्न  करने के लिए किया जाता   है। 

 

 

 

 

 

 

     ***** सरहुल  नृत्य  *****

* यह  छत्तीसगढ़  की उराँव  जनजाति का प्रसिद्ध लोकनृत्य है।  यह सरगुजा  क्षेत्र  का  लोकप्रिय  नृत्य है। 

* उराँव  जनजाति  के लोग  सरना नामक देवी का निवास साल (सरई ) वृक्ष   में मानते है  एवं  प्रतिवर्ष  चैत्र  मास की पूर्णिमा  पर साल  वृक्ष के चारो ओर  घूम -घूमकर  उत्साहपूर्वक  यह  नृत्य करते है। 

* उराँव  जनजाति  की मान्यता  है कि  इनके देवता  साल नामक  वृक्ष पर निवास करते है। 

* यह  नृत्य  साल वृक्ष  में फूल  लगने पर किया जाता है।  

 

 

 

         ***** दशहरा  नृत्य ******

* यह बैगा  आदिवासियों  का नृत्य है। यह नृत्य  दशहरा  पर्व  पर  राज्य  में प्रारम्भ  हुआ था , इसलिए  इस नृत्य का नाम दशहरा पड़ा। 

 

 

 

          ****** ढांढल  नृत्य  *****

* यह नृत्य  कोरकू  आदिवासियों द्वारा  ज्येष्ठ -आषाढ़  की रातो  को किया जाता  है।  

* ढांढल   नृत्य  के साथ श्रृंगार  गीत भी  गाए  जाते है और  नृत्य  करते समय लोग एक -दूसरे  पर  छोटे -छोटे  डंडों  से  प्रहार करते है।    

 

 

 

 

      ***** गौर  नृत्य *****

* यह नृत्य  दण्डामी  माड़िया  जनजातियों में प्रचलित है। 

* इसके अंतर्गत  गौर ( जंगली भैंस )  या बाइसन  के सींग  लगाकर  नृत्य किया जाता है।  

* बस्तर में दशहरा  के  जात्रा पर्व  के अवसर  पर  यह नृत्य किया जाता है। 

* इस नृत्य  में पुरुष  व महिला  दोनों  भाग लेते है।  

 

      

 

 

    ****** हुल्की  पाटा  नृत्य  *****

* हुल्की  पाटा  घोटुल का सामूहिक  मनोरंजक  लोकनृत्य है।  इसे अन्य  सभी  अवसरों  पर  भी  किया जाता है।   इसमें लड़कियां  व लड़के  दोनों भाग लेते है। 

* हुल्की  पाटा  मुड़िया  जनजाति के सांसारिक  जीवन  को अधिक प्रभावित  करता है।  यह बस्तर  संभाग  में प्रचलित है। 

 

 

 

 

     ***** डंडारी  नृत्य  ***** 

  * यह  नृत्य प्रतिवर्ष  होली के अवसर पर बस्तर भाग में  आयोजित होती है।  विशेष  रूप से  मुरिया -भतरा  इस नृत्य  में रूचि  लेते है। 

* नृत्य  के प्रथम दिन  गांव के बीच चबूतरा बनाकर उस पर एक सेलम  स्तम्भ  स्थापित  किया जाता है  और फिर  ग्रामवासी उसके चारो ओर घूम -घूमकर  नृत्य करते है।  बाद में डंडारी  नर्तक यात्रा कर गांव -गांव  में नृत्य  प्रदर्शित करते है। 

 

 

 

 

 

      ****** बिलमा  नृत्य ******

* बिलमा  बैगा  और गोण्ड  आदिवासियों  का लोकप्रिय  नृत्य है , जो  प्रायः  शीत  ऋतु में  दशहरा के अवसर पर  आयोजित  होता है।  इसमें  स्त्री -पुरुष  दोनों भाग लेते है। 

 

 

 

 

 

 

     ***** थापती  नृत्य  ******

* यह नृत्य  कोरकुओं  का पारम्परिक नृत्य है।  यह चैत्र -बैसाख  महीने  में किया जाता है।  इस नृत्य  के मुख्य वाद्ययंत्र   ढोल और  ढोलक  है।  

 *  पुरुष  व  महिला  दोनों  इस नृत्य में भाग  लेते है।  इस  नृत्य  के आरम्भ  में कोरकू  जनजाति  के लोग  मेघनाथ खम्भ की स्थापना करते है।   

 

 

 

 

 

   

          **** परधौनी  नृत्य  ******

* यह  बैगा  जनजाति का प्रमुख नृत्य है।  

*  यह  मुख्यतः  विवाह के अवसर पर  बारात  आगमन  के समय किया जाता है। 

* इस नृत्य में वर पक्ष की ओर से  हाथी  बनाकर  नचाया जाता है।  

* इस नृत्य का प्रमुख  वाद्ययंत्र  नगाड़ा  और  टिमकी है।  

 

 

 

 

 

 

 

   ****** दहिकान्दो  ******

* राज्य के मैदानी भाग के आदिवासी कृष्ण  जन्माष्टमी  के अवसर पर  दहिकान्दो  नामक  नृत्य  का प्रदर्शन  करते है।  यह करमा  और रास  का मिला -जुला  रूप  है।  

 

 

 


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