Thursday, 20 August 2020

छत्तीसगढ़ की भू - वैज्ञानिक संरचना , Earth scientific structure of chhattisgarh, garbhik sthiti , cgpsc

 

 

***छत्तीसगढ़ की भू - वैज्ञानिक  संरचना***

 

 

 

छत्तीसगढ़ पृथ्वी के प्राचीन भूखण्ड गोण्डवाना  लैण्ड का एक हिस्सा है।  यहां की भू - गार्भिक  संरचना  अत्यधिक  विविधतापूर्ण हैं। 

शैलो के वितरण के आधार पर  प्रदेश को लगभग  निम्न  भागों में  बांटा गया है :-

 

1.  आद्य  महाकल्प  या  आर्कियन  शैल समूह 

2.  धारवाड़  शैल समूह 

3.  कड़प्पा  शैल समूह 

4.  विन्ध्यन  शैल समूह 

5.  प्री -  कैम्ब्रियन  शैल समूह 

6.  गोण्डवाना  शैल समूह 

7. दक्कन  ट्रैप  शैल समूह 

8.  लैटेराइट  शैल समूह 

9.  एल्यूवियम  शैल समूह ( जलोढ़  शैल )


शैलो का वितरण निम्न प्रकार है :-

 

            *** १. आद्य महाकल्प या आर्कियन*****

 

* आर्कियन  चट्टाने  प्राचीन  तथा कठोर  होती है।  ये चट्टानें  मुख्यतः  लावा  के  ठण्डे  होने से निर्मित  जीवाश्म रहित चट्टानें हैं।  

 

* आर्कियन  शैल समूह  में ग्रेनाइट , नीस , माइका  आदि पाई  जाती है। 

* छत्तीसगढ़ में इसका विस्तार  बघेलखण्ड  के पठार , जशपुर - सामरीपाट , राजगढ़ बेसिन  तथा दंडकारण्य में है।  

* लगभग  सम्पूर्ण  छत्तीसगढ़  का 50 % भाग  आर्कियन  चट्टानों से बना हुआ है। इसलिए  यह छत्तीसगढ़ का सबसे  बड़ा शैल समूह है।

 

* यह शैल समूह गहरे स्थानों पर पाया जाता है। 

 

 

       ****** २.  धारवाड़  शैल समूह *****

 

* यह जलीय  अवसादी  चट्टानें है , जिसका  निर्माण  आर्कियन  चट्टानों  के अपरदन  से हुआ  है।  इनमे  जीवाश्म  नहीं होता है।  

*  इस समूह में टीन तथा लौह अयस्क पाया जाता है। 

* धारवाड़  शैल  समूह  राज्य  के मैदानी  भू - भाग  ,कसडोल  ,पण्डरिया , कबीरधाम  तहसीलों में  तथा  दंडकारण्य  के  मोहेला (दक्षिण  भाग )   , भानुप्रतापपुर , जगदलपुर  और दंतेवाड़ा  तहसीलों में पाए  जाते है। 

* इस शैल समूह में मुख्यतः  तीन  सीरीज  पाई जाती है :-

* चिल्फी  घाटी  सीरीज -इसका  विस्तार  बिलासपुर जिले  के  शिस्त  शैल  क्षेत्र  के उत्तर -पूर्व में दक्षिण  -पश्चिमी दिशा  में है।  यह सीरीज  रतनपुर  के उत्तर -पूर्व से प्रारम्भ  होकर  मैकाल  के पश्चिम  तक व्यवस्थित रूप में मिलती है 

* सोनाखान  सीरीज -धारवाड़ समूह  के बाहर  वाले छोटे भागो  को एफ  एच  स्मिथ  ने सोनाखान  सीरीज  नाम दिया था।  

* दण्डकारण्य  प्रदेश  की लौह -अयस्क  सीरीज -इसका  विस्तार  दुर्ग  जिले  में  संजारी   बालोद  तहसील  के दक्षिणी  भाग में  छोटी पहाड़ी  के रूप में है।  

 

 

  ******  ३.  कड़प्पा  शैल  समूह  *****


* इस शैल समूह का निर्माण  ग्रेनाइट  चट्टानों  के अपरदन  से हुआ है।  

* यह शैल  समूह  छत्तीसगढ़  राज्य का दूसरा  सबसे बड़ा समूह (25 -30 %) है। 

* इस शैल समूह की आकृति  पंखाकार  है , जिसके कारण  छत्तीसगढ़  के मैदान का  निर्माण हुआ है। 

* इस  शैल समूह में चूना पत्थर  एवं डोलोमाइट  पाया जाता  है। 

* इस शैल समूह का सर्वाधिक  विस्तार  जगदलपुर  , महासमुंद , भोपालपट्टनम  , सरायपाली , नवागढ़ , धमधा , दुर्ग  , गुंडरदेही पाटन , जांजगीर -चांपा  ,बिल्दा , बिलासपुर ,  बलौदबाज़ार ,  तिल्दा  , कसडोल , बिलाईगढ़  आदि में हुआ है। 

इस शैल समूह में मुख्यतः दो सीरीज पाई  जाती है :-

 

* रायपुर  सीरीज - यह  दुर्ग , रायपुर  एवं  बिलासपुर  तक विस्तृत है। 

 

* चंद्रपुर  सीरीज - यह फिंगेश्वर , महासमुंद ,  होटाड ,   धानसिर , मधुवन  होते  हुए  रायपुर  जिले के दक्षिण  भाग में  रायगढ़ तक  विस्तृत है।  

 

     

       ******* ४.  विंध्यन  शैल समूह  *****

* इस शैल समूह का निर्माण  कड़प्पा  काल  के बाद  हुआ है।   इसका विस्तार  क्षेत्र  इंद्रावती  संघ  का जगदलपुर समूह  और  रायपुर  संघ का रायपुर  , बालोद   है।   इस शैल समूह  की  चट्टानें  जलज  चट्टानें है, जो नर्मदा बेसिन  में पाई  जाती है।  

 

 

 

       ****** ५.  प्री - कैम्ब्रियन  शैल समूह *****

 *  इस शैल समूह  का निर्माण  ज्वालामुखी  उद्भेदन  से हुआ है।  इसका विस्तार  राजनांदगांव  , दुर्ग  तथा बालोद  जिले में है।  

 

 

       ***** ६.  गोण्डवाना  शैल समूह  *****

* इस  शैल समूह का निर्माण  नदियों  के अवसादों  तथा वनस्पति  एवं  जीवो  के  अवशेषों  द्वारा हुआ है। 

* राज्य के लगभग  17 %  भाग  में गोण्डवाना  शैल समूह  का विस्तार पाया जाता है। 

* छत्तीसगढ़  में  गोण्डवाना  शैल समूह  का  सर्वोत्तम  अध्ययन  1872  ई.  में  मेडलीकाण्ड  ने  किया तथा  इन्हे  गोण्डवाना  शैल समूह नाम दिया था। 

* इस शैल समूह  में  कोयला  , लौह  अयस्क  एवं  जीवाश्म  पाया जाता  है। 

* यह  शैल समूह  दक्षिण -पूर्व  की ओर  स्थित  महानदी  घाटी  का अनुगमन  करता हुआ  विस्तृत  है।  यह  रायगढ़  के मध्य  भाग  में तथा   बिलासपुर  के उत्तर -पूर्वी  भाग  तक विस्तृत है।  

इस शैल समूह की तीन  सीरीज निम्न है :-

 * ऊपरी  गोण्डवाना  - यह  बघेलखण्ड  के जशपुर , मनेंद्रगढ़  , प्रतापपुर , बैकुंठपुर  , सूरजपुर  आदि  तहसीलों  में विस्तृत  है।  इस  शैल  क्रम  में कोयले  की मोटी  परत है। 

* मध्य  गोण्डवाना - यह  महानदी  घाटी  में  विस्तृत  है।  इसे  परसोरा  तथा  टिकी  नाम से जाना जाता है। इसका  विकास प्रायः  छत्तीसगढ़  में नहीं  हुआ  है। इसमें  जीवाश्म पाया जाता है। 

*  निचला  गोण्डवाना -यह  शैल समूह   मनेन्द्रगढ़  , बैकुंठपुर , सरगुजा , अंबिकापुर , कटघोरा , कोरबा , खरसिया , धरमजयगढ़  तथा  रायगढ़  तहसीलों  में विस्तृत  है।  यह कोयला तथा बालू  पत्थर से निर्मित  है। 

 

 

  ***** ७.  दक्कन  ट्रैप  शैल  समूह ****

* इस  शैल समूह  का निर्माण  दरारी  ज्वालामुखी  से  निकले हुए  बेसाल्ट युक्त  लावा से हुआ है। 

* यह मैकाल श्रेणी के पूर्व  भाग  कवर्धा  ,  राजनांदगांव  जिले में तथा  जशपुर  -सामरीपाट  प्रदेश  में विस्तृत है। 

* बेसाल्ट  चट्टानों  के अपरदन  से काली  मिट्टी  का निर्माण  होता है।  इसमें मुख्य रूप से बाक्साइड  खनिज पाया जाता है। 



    ******८.  लैटेराइट  शैल समूह  *****

* इस शैल समूह  का निर्माण दक्कन ट्रैप के क्षरण से  हुआ है। 

* इसका विस्तार  रायपुर (आर्कियन  शिस्ट ) ,दुर्ग  (धारवाड़  शिस्ट ) ,तलचीर  की क्ले  , रायगढ़  व बिलासपुर  में हिमगिरि  शैल  और  बिलासपुर  व दुर्ग  में दक्कन  ट्रैप के ऊपर  पाया जाता है। 

* इसमें मैगनीज  व बाक्साइड  जैसे  खनिज पाए जाते है।  इसमें  फसल  उत्पादकता  बहुत  कम होती है।  

 

 

    ***** ९.  एल्यूवियम  शैल समूह (जलोढ़ )******

 * एल्यूवियम  शैल नदी  घाटियों तथा  नालो  के तटों  पर पाई  जाती है।  इसे  कछार भी कहते है।  सरगुजा  एवं जशपुर  जिले के कुछ भाग  में इसका  विस्तार है। 

 

* जलोढ़  मैदान का विस्तार  राज्य  में बहुत  कम पाया जाता  है।  

   

            

 




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